Thursday, June 6, 2013

"My dear Jenny"

"हमारी प्यारी जेनी" 
 

आज हमारी जेनी हमें छोड कर चली गयी!! पिछले दस दिनों से वो काफी तकलीफ में थी। जब भी हम उसके आस पास होते वो हमे अपने करुणा भरे आँखों से देखती और चाहती थी पहले जैसे दौड़ कर आये और हमारे साथ खेले पर उसकी शारीरिक हालात उसे निर्जीव  रहने के लिए मजबूर कर देते।
 
 
पिछले दस दिनों से उसने खाना बंद कर दिया था, कुछ भी वो खाती उसे तुरंत उलटी हो जाता उसका पेट फूल गया था। हमें समझ नहीं आ रहा था उसे क्या हो गया है। उसे हम डाक्टर के पास ले कर गए कुछ दवा और इंजेक्शन देने के बाद उन्होंने कहां कुछ नहीं होगा लगता है इन्फेक्शन हो गया है दवा से ठीक हो जाएगा।
लेकिन कुछ भी ठीक नहीं हुआ जेनी की हालत दिन ब दिन बिगडती जा रही थी। अंत में हम उसे बेलगछिया एनिमल हॉस्पिटल ले कर गए जैसा सरकारी अस्पतालों में होता है वही परिणाम हमें भी भुगतना था। सरकारी डाक्टर ने परीक्षा करने के बाद बताया " इसके गर्भाशय में इन्फेक्शन हो चुका है  फ़ौरन इलाज चालू करना पडेगा " और दवावो की एक लम्बी फेहरिस्त पकडा दिया। हम फ़ौरन दवा और सेलाइन वाटर लेकर आ गये। डाक्टर ने उसे सुबह शाम सेलाइन वाटर चढाने को कहा। उसका पानी पीना और खाना सब कुछ बंद था वो इतनी कमजोर हो चुकी थी कि खड़ी भी नहीं हो पा रही थी।
 
 
तीन दिन के इलाज से हमें पता चल गया था सिर्फ हमसे पैसा खर्च कराया जा रहा है और जो बन्दा उसे सेलाइन वाटर चढने आता था वो तो चाहता था सारी उमर वो बस उसे सेलाइन चढ़ाता रहे और प्रत्येक बार आने के वह सुबह शाम तीन सौ करके यानी कुल छ सौ रुपये उसे मिलते रहे। उसकी तबियत में सुधार की जगह और बिगड़ती जा रही थी।
 .
 
तभी हमारे एक परिचित ने बेहाला में एक और डाक्टर संजय दत्त के बारे में बताया जो काफी अनुभवी और विख्यात है। हम उसे लेकर बेहाला पहुंचे। डाक्टर ने उसकी हालत देख कहा "मुझे आश्चर्य हो रहा है कि इसकी बिमारी पकड लेने के बावजूद बेलगछिया एनिमल हॉस्पिटल के डाक्टर ने इसका ऑपरेशन क्यों नहीं किया अगर इसका ऑपरेशन उसी वक़्त हो जाता तो यह अब तक ठीक भी हो गयी होती " उन्होंने फ़ौरन उसका इलाज़ चालू कर दिया और कहाँ अगर आप कुछ दिन पहले लाते तो शायद मैं इसे बचा लेता इसका इन्फेक्शन इतना बढ चुका है की उसे दवा से ठीक करना अभी नामुमकिन है और उसने ऑपरेशन के लिए कहा, हमने फ़ौरन इसके लिए हामी भर दी हम किसी भी हालत में जेनी को बचाना चाहते थे। करीब दो घंटे के मेहनत के बाद ऑपरेशन सफलता पूर्वक पूरा हुआ लेकिन खतरा टला नहीं था ७२ घंटे तक जेनी को अपने मौत से लडना था। हम उसे घर ले आये। उसे देख कर लग रहा था शायद सब कुछ ठीक हो जाएगा।लेकिन कहते है न जानवरों के पास छटी  इन्द्रिय होती है उन्हें पता चल जाता है क्या होने वाला है वो सभी की तरफ बहुत ही करुण दृष्टि से देख रही थी हम सभी उसके आस पास बैठे थे। रात करीब एक बजे वह बड़ी बैचैनी से अपने सर को हिलाने लगी और दो बार उसने उलटी करने के बाद तडपते हुए अपने शरीर को ढिला छोड़ दिया और वो हमे छोड़ सदा सदा के लिए चली गयी।
 

हमें अफ़सोस हो रहा था काश हम उसे पहले सही डाक्टर के पास ले जा पाते या काश सरकारी डाक्टर उसकी हालत की गंभीरता समझ अगर उसी दिन उसका ऑपरेशन कर देते तो शायद जेनी हमारे साथ होती।
 
 
रात को ही शोकाकुल अवस्था में हमने खोज खबर लगा एक एनिमल बुरिअल ग्राउंड का पता लगाया हम कम से कम उसे गरिमापूर्वक अतिम बिदाई देना चाहते थे शायद हम उसकी वफादारी के लिए इससे ज्यादा कुछ दे नहीं सकते थे। रात में करीब दो बजे हम सभी उसे एक गाडी में ले हमारे घर से करीब तीस किलोमीटर दूर बकराहाट में "करुणा कुञ्ज " ले कर गए और उसे सम्मानपूर्वक दफना दिया। सभी के आँखों में आंसू थे हम अपने ज़ज्बातो को शायद अपने आँखों से ही व्यक्त कर सकते थे। 
 
 
इस घटना से हमे सीख मिली हमे जब पहली बार उसके बीमार होने का पता चला था हमे उसे अनदेखा नहीं कर फौरन किसी अच्छे डाकटर के पास ले जाना चाहिए था लेकिन हम स्थिति के बिगड़ने तक इंतज़ार करते रहे अगर हम उसके पहली चेतावनी को समझ पाते तो शायद हमारी प्यारी जेनी हमारे साथ होती।
हम आभारी है "करुणा कुञ्ज " के जो वो यह नेक काम इन बेजुबान साथियो के लिए कर रहे है ताकि हम इनके निस्वार्थ सेवा के लिए कम से कम इन्हें एक सम्मान पूर्वक अंतिम विदायी दे पाये।  

राजेश साव
०६/०६/२०१३
 

No comments:

Post a Comment